
शहर की उसी सड़क पर, जहाँ कल तक कढ़ी उबलती थी और चावल की भाप उड़ती थी, आज “दबाव” की राजनीति पकती नज़र आती है। वही हाथ, जो कभी कढ़ी की कलछी थामे होता था, अब माइक पकड़कर प्रशासन को “चेतावनी” देता दिखाई देता है।
यह कहानी है एक काल्पनिक ‘प्रधान उनील’ की—जिसने कढ़ी-चावल बेचते-बेचते खुद को क्रांतिकारी दबाव मंच का सर्वेसर्वा घोषित कर दिया।
कहते हैं मेहनत से तरक़्क़ी होती है, पर यहाँ तरक़्क़ी का फ़ॉर्मूला कुछ अलग निकला—
👉 कढ़ी कम, दबाव ज़्यादा
👉 सेवा कम, शोर ज़्यादा
प्रधान बनने के बाद उम्मीद थी कि पत्रकारों की आवाज़ मज़बूत होगी। लेकिन व्यंग्य यह है कि यहाँ आवाज़ मज़बूत नहीं हुई—आवाज़ दबाई गई।

पत्रकारों की मदद? नहीं।
प्रशिक्षण? नहीं।
सहयोग? भूल जाइए।
उल्टा, इस काल्पनिक कथा में बताया जाता है कि कैसे संगठन चलाने के नाम पर मनगढ़ंत खबरों, बेइमानी भरे आरोपों और अफवाहों की कढ़ी रोज़ परोसी जाने लगी।

शहर में चर्चा है—“ये संगठन है या डराने का ठेला?“
कभी किसी अफ़सर पर दबाव,
कभी किसी दुकानदार पर धमकी,
कभी किसी पत्रकार पर कीचड़—
और हर बार दावा वही:
“हम जनता के लिए लड़ रहे हैं।“
पर जनता पूछ रही है—
“लड़ किससे रहे हो? और किसके लिए?”
कहा जाता है कि इस काल्पनिक प्रधान को न पत्रकारिता की मर्यादा की चिंता है, न सम्मान की। चिंता है तो सिर्फ़ पैसे की, वसूली की, और भीड़ दिखाने की।

जहाँ भी चार लोग इकट्ठा हो जाएँ, वहीं मंच।
जहाँ मंच, वहीं दबाव।
और जहाँ दबाव, वहीं फायदा।
आज भी कढ़ी-चावल बिक रहा है—
फर्क बस इतना है कि
पहले प्लेट में कढ़ी गिरती थी,
अब लोगों पर आरोप गिरते हैं।
यह व्यंग्य किसी पेशे पर नहीं, बल्कि उस सोच पर है—
जो मेहनत को हथियार नहीं,
डर को व्यापार बनाती है।
Disclaimer यह लेख पूर्णतः व्यंग्यात्मक है।सभी नाम, संगठन, घटनाएँ काल्पनिक हैं।किसी वास्तविक व्यक्ति या संस्था से कोई संबंध नहीं।यह समाजिक कटाक्ष है, आरोप नहीं।



