₹20–₹30 की दाढ़ी से‘ चेयरमैन’ तक! लॉकडाउन से पहले कैंची, लॉकडाउन के बाद लेटरहेड—ये सफ़र कैसे हुआ?

कुर्सी पर बैठी दाढ़ी और कुर्सी पर बैठे ‘चेयरमैन’ का फर्क बस इतना—
पहले बाल कटते थे, अब शिकायतें और लोगों की जेबें!
(विशेष रिपोर्ट | PART–2)
शहर की गलियों में एक तस्वीर आजकल खूब घूम रही है—
कुर्सी पर बैठा एक शख़्स,
और सामने कैंची पकड़े दूसरा शख़्स। तस्वीर आम लगती है… पर सवाल असाधारण है।
क्योंकि यही तस्वीर लोगों को याद दिलाती है उस दौर की, जब ₹20–₹30 लेकर दाढ़ी में बाल काटे जाते थे,
और आज उसी तर्ज़ पर दर्जनों शिकायतें “कट-कट” कर सिस्टम में डाली जाती हैं। कैंची से कुर्सी तक का करियर ग्राफ
लॉकडाउन से पहले—
ग्राहक,
कुर्सी,
कैंची,
और ₹20–₹30 की मेहनताना।

लॉकडाउन के बाद—
लेटरहेड,
“प्रेस ग्रुप” का नाम,
PGRS पोर्टल,
और रोज़ की शिकायतें।
लोग तंज़ में पूछ रहे हैं—
“क्या ये ‘स्किल अपग्रेड’ है या ‘कुर्सी अपग्रेड’?”
जहाँ पहले बाल कटते थे, अब विभाग कटते हैं
पहले—
“भाई, दाढ़ी छोटी कर दो।”
अब—
“भाई, शिकायत बड़ी डाल दो।”
पहले ग्राहक आईने में देखता था,
अब अधिकारी फ़ाइलों में देखता है।
तरीका बदला,
औज़ार बदले,
कैंची की जगह हाथ में एंड्रॉयड मोबाइल आ गया।
₹30–₹20 का हिसाब और ‘चेयरमैन’ का रुतबा
लोगों की स्मृति बड़ी तेज़ होती है।
उन्हें याद है—
कभी ₹30 इकट्ठे करने में भी पसीना निकल जाता था,
और आज—
“चेयरमैन” लिखा विज़िटिंग कार्ड,
“प्रेस ग्रुप” की मोहर,
और शिकायतों की कतार।

ਲੋਕ ਹੱਸ ਕੇ ਕਹਿੰਦੇ ਨੇ—
“ਦਾਢੀ ਵਿੱਚ ਵਾਲ ਘੱਟ ਸਨ,
ਹੁਣ ਸਿਸਟਮ ਵਿੱਚ ਸਬਰ ਘੱਟ ਰਹਿ ਗਿਆ ਹੈ।”
पत्रकारिता या ‘कैंची कारिक्ता?
यहां सवाल पेशा बदलने का नहीं,
दावा बदलने का है।
अगर कोई खुद को
“पत्रकार संगठन का चेयरमैन” बताता है,
तो लोग पूछेंगे ही—
रजिस्ट्रेशन कहां है?
सदस्य कौन हैं?
चुनाव कब हुए?
और संगठन किस कानून के तहत है?

वरना लोग कहेंगे—
“नाम बदला है, काम नहीं।”
तस्वीर का संदेश साफ़ है—हँसी भी, सवाल भी
यह तस्वीर किसी को नीचा दिखाने के लिए नहीं,
बल्कि एक सिस्टम पर कटाक्ष है—
कि कैसे ₹20–₹30 की कैंची से शुरू हुआ सफ़र, सीधे ‘प्रेस चेयरमैन’ की कुर्सी तक पहुँच गया।

निष्कर्ष: बाल काटना गुनाह नहीं, पर भ्रम फैलाना सवाल है
यह लेख किसी पेशे का अपमान नहीं करता। कैंची चलाना भी मेहनत है, कलम चलाना भी। पर जब
कुर्सी और पहचान का दावा बिना आधार के किया जाए,
तो व्यंग्य जन्म लेता है। और यही व्यंग्य आज पूछ रहा है—
“क्या ₹30–₹20 में दाढ़ी काटने वाला,
सिर्फ़ लेटरहेड के सहारे पत्रकार संगठन का चेयरमैन बन सकता है?”
⚖️ DISCLAIMER
यह लेख व्यंग्य और प्रतीकात्मक तुलना पर आधारित है। इसमें दर्शाए गए पात्र, परिस्थितियाँ और संदर्भ किसी वास्तविक व्यक्ति या पंजीकृत संस्था की सीधी पहचान नहीं करते।



