आबकारी विभाग की नाक के नीचे रेलवे स्टेशन के पास 24 घंटे खुल रहते है एक कि बजाए 2-2 शराब के ठेके, प्रशासन मौन?

जालंधर, 15 अक्टूबर 2025: जालंधर रेलवे स्टेशन के पास आबकारी नीति (Excise Policy) और जिला प्रशासन के आदेशों की सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। यहाँ एक की बजाय दो-दो शराब के ठेके दिन-रात, 24 घंटे खुले रहते हैं, जिसमे एक ठेका ऋषि नगर रेलवे स्टेशन के पास जिसकी तो परमिशन प्रशासन से ले रखी है, दूसरा ठेका जोकि मंडी रोड रेलवे स्टेशन के पास वो अवैधरूप से बिना परमिशन के खोला जाता है, जबकि आबकारी विभाग सब कुछ जानते हुए भी अनजान बना हुआ है। इस मामले ने विभाग की कार्यप्रणाली और अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

शहर में कानून-व्यवस्था बनाए रखने और आबकारी नीति का सख्ती से पालन करवाने के लिए पुलिस कमिश्नर और डिप्टी कमिश्नर (DC) द्वारा स्पष्ट आदेश जारी किए गए हैं, जिनमें शराब की दुकानों के खुलने और बंद होने का समय निर्धारित है। इसके बावजूद, रेलवे स्टेशन के पास स्थित ये एक ठेका इन आदेशों को ताक पर रखकर अपना कारोबार किआ जा रहा हैं। हैरानी की बात यह है कि आज तक आबकारी विभाग के किसी भी अधिकारी ने इन पर कोई कार्रवाई करना तो दूर, इन्हें जांचने की जहमत भी नहीं उठाई है।
क्या कहता है आबकारी अधिनियम?
पंजाब आबकारी अधिनियम, 1914 (Punjab Excise Act, 1914) के तहत राज्य में शराब की बिक्री को नियंत्रित किया जाता है। नीति के अनुसार, शराब की दुकानों के संचालन का समय तय होता है और निर्धारित समय के बाद बिक्री करना एक दंडनीय अपराध है।

उल्लंघन पर कार्रवाई:
अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करने पर ठेके का लाइसेंस रद्द किया जा सकता है, भारी जुर्माना लगाया जा सकता है और संबंधित ठेका मालिक के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
अधिकारियों की जवाबदेही:
यदि कोई आबकारी अधिकारी अपने कर्तव्य का निर्वहन करने में विफल रहता है या जानबूझकर अवैध गतिविधियों को नजरअंदाज करता है, तो उसके खिलाफ भी विभागीय जांच और अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रावधान है।
प्रशासन पर उठता सवालिया निशान?
इस ठेके का 24 घंटे खुला रहना आबकारी विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत के बिना संभव नहीं लगता। यह स्थिति एक बड़ा सवाल खड़ा करती है?

क्या सरकारी अधिकारी खुद ही सरकारी नीतियों को कमजोर कर रहे हैं? अगर शहर के सबसे व्यस्त इलाकों में से एक में कानून का इस तरह मज़ाक उड़ाया जा रहा है, तो दूर-दराज के क्षेत्रों में स्थिति का अंदाजा लगाना मुश्किल नही है। अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन इस मामले पर कब अपनी चुप्पी तोड़ता है और कानून का उल्लंघन करने वालों और उन्हें संरक्षण देने वाले अधिकारियों पर क्या कार्रवाई करता है?



