मोदी जी के जालंधर दौरे में संगठनात्मक संतुलन पर सवाल

जालंधर देहाती भाजपा की अनुपस्थिति से कार्यकर्ताओं में नाराज़गी
संत शिरोमणि सतगुरु रविदास महाराज जी के पावन प्रगटोत्सव के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जालंधर (रायपुर बल्लां) आगमन आस्था, सामाजिक समरसता और सम्मान का प्रतीक रहा। लेकिन इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम के दौरान भाजपा संगठन की आंतरिक कार्यप्रणाली को लेकर कई संगठनात्मक प्रश्न भी उभरकर सामने आए हैं।
जालंधर देहाती भाजपा की भूमिका पर उठे सवाल भाजपा के संगठनात्मक ढांचे में यह सामान्य प्रक्रिया मानी जाती है कि प्रधानमंत्री या किसी वरिष्ठ राष्ट्रीय नेता के कार्यक्रम में संबंधित राज्य, जिला और स्थानीय इकाइयों की सहभागिता सुनिश्चित हो।

लेकिन इस अवसर पर जालंधर देहाती भाजपा की पूरी संगठनात्मक टीम की अनुपस्थिति ने कार्यकर्ताओं और राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान खींचा है।
देहाती इकाई से जुड़े कार्यकर्ताओं का कहना है कि उन्हें कार्यक्रम को लेकर न कोई औपचारिक सूचना दी गई और न ही किसी स्तर पर समन्वय स्थापित किया गया। इससे यह भावना गहराई कि संगठन के एक बड़े हिस्से को नजरअंदाज कर दिया गया।
आस्था का कार्यक्रम या दृश्यता की राजनीति?कार्यकर्ताओं के अनुसार, जहां एक ओर कार्यक्रम आस्था और सम्मान से जुड़ा था, वहीं दूसरी ओर कुछ चुनिंदा चेहरे पहले से ही प्रचार सामग्री, फ्लेक्स बोर्ड और मीडिया कवरेज के साथ सक्रिय नजर आए।इस स्थिति ने “फोटो पॉलिटिक्स” और जमीनी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा को लेकर नई बहस को जन्म दिया है।
“कार्यकर्ता ही रीढ़ हैं” — दावा और हकीकत
भाजपा मंचों से यह कहा जाता रहा है कि कार्यकर्ता ही पार्टी की रीढ़ हैं, लेकिन जालंधर देहाती क्षेत्र के कई जमीनी कार्यकर्ता खुद को हाशिये पर खड़ा महसूस कर रहे हैं।गांव-गांव और मोहल्ला-मोहल्ला पार्टी के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं का मानना है कि उनकी भूमिका अक्सर रैलियों और चुनावी भीड़ तक सीमित कर दी जाती है।
जब सबसे बड़े कार्यक्रमों में ही जमीनी कार्यकर्ताओं की भागीदारी न हो, तो संगठनात्मक संतुलन पर सवाल उठना स्वाभाविक माना जा रहा है।
2027 से पहले संगठन के लिए चेतावनी?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि भाजपा को 2027 में पंजाब में मजबूत राजनीतिक विकल्प के रूप में स्थापित होना है, तो उसे अपने जमीनी कार्यकर्ताओं के विश्वास और सहभागिता को प्राथमिकता देनी होगी।कार्यकर्ताओं के बीच यह चर्चा अब खुलकर सामने आ रही है कि यदि उन्हें सम्मान और संवाद नहीं मिलेगा, तो संगठनात्मक ऊर्जा कमजोर हो सकती है।
आत्ममंथन की जरूरत
यह रिपोर्ट किसी व्यक्ति या पदाधिकारी पर आरोप नहीं लगाती, बल्कि संगठनात्मक संतुलन, संवाद और समावेशन की आवश्यकता को रेखांकित करती है।भाजपा नेतृत्व के लिए यह समय आत्ममंथन का माना जा रहा है कि कहीं प्रचार और दृश्यता की राजनीति जमीनी सिपाहियों की मेहनत पर भारी तो नहीं पड़ रही।यदि समय रहते जालंधर देहाती जैसे क्षेत्रों के कार्यकर्ताओं की भावनाओं को समझकर उन्हें संगठनात्मक प्रक्रिया में सम्मानजनक स्थान दिया गया, तो यही कार्यकर्ता पार्टी की सबसे बड़ी ताकत बन सकते हैं।अनदेखी की स्थिति में, यह असंतोष भविष्य की राजनीतिक चुनौतियों को जन्म दे सकता है।




