गजब है नगर निगम का ज्ञान: 1.5 साल पुरानी ‘अवैध बीमारी’ अब ‘इलाज’ के लायक नहीं?

रिहायशी फ्लैटों में शोरूम का ‘अजूबा’: निगम को नियमों से ज्यादा शिकायतकर्ता की ‘नीयत’ में दिलचस्पी!
PPR MALL ऋषि नगर रिहायशी उल्लंघन मामला: बिल्डिंग ब्रांच की रिपोर्ट ने खड़े किए गंभीर सवाल; क्या पुराना होने से ‘अवैध कमर्शियल गतिविधि’ हो जाती है वैध?
“निगम की रिपोर्ट पढ़कर ऐसा लगता है जैसे नियमों की भी ‘एक्सपायरी डेट’ होती है—अगर उल्लंघन 1.5 साल पुराना हो जाए, तो वह अधिकारी की नजर में ‘पुण्य’ बन जाता है।”
जालंधर (न्यूज इंडिया नाउ): जालंधर नगर निगम के बिल्डिंग विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर सुर्खियों में है। PPR MALL ऋषि नगर में रिहायशी फ्लैटों के अवैध कमर्शियल रूपांतरण के मामले में विभाग द्वारा उच्च अधिकारियों को भेजी गई हालिया रिपोर्ट ने प्रशासन की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
नियमों की व्याख्या या जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना?
ताजा घटनाक्रम में, संबंधित क्षेत्र के बिल्डिंग इंस्पेक्टर द्वारा शिकायत के जवाब में यह तर्क दिया गया है कि उक्त निर्माण लगभग 1.5 साल पुराना है और वहां कोई नई निर्माण गतिविधि नहीं हो रही है। हैरान करने वाली बात यह है कि शिकायत ‘अवैध निर्माण’ की नहीं, बल्कि ‘चेंज ऑफ लैंड यूज’ (CLU) के उल्लंघन की थी।

कानूनी जानकारों का मानना है कि पंजाब म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन एक्ट के तहत, रिहायशी बिल्डिंग का कमर्शियल इस्तेमाल एक ‘निरंतर जारी रहने वाला अपराध’ (Continuing Offence) है। ऐसे में निर्माण के “डेढ़ साल पुराने” होने का तर्क देना, नियमों की गलत व्याख्या करने और उल्लंघनकर्ताओं को परोक्ष रूप से सुरक्षा प्रदान करने जैसा प्रतीत होता है।
शिकायतकर्ता पर टिप्पणी: एक खतरनाक प्रशासनिक मिसाल
रिपोर्ट में सबसे चौंकाने वाला पहलू वह है, जिसमें अधिकारी ने शिकायतकर्ता की नीयत और उसके द्वारा की गई पूर्व शिकायतों पर सवाल उठाए हैं। प्रशासनिक गलियारों में इस बात की चर्चा है कि क्या अब सरकारी अधिकारी शिकायतों का निपटारा तथ्यों के आधार पर करने के बजाय शिकायतकर्ता के ‘ट्रैक रिकॉर्ड’ के आधार पर करेंगे?

किसी सजग नागरिक द्वारा भ्रष्टाचार या नियमों के उल्लंघन की बार-बार रिपोर्ट करना उसका नागरिक कर्तव्य है। ऐसे में अधिकारी द्वारा इसे “निजी कारणों” से प्रेरित बताना न केवल अनैतिक है, बल्कि मुख्य मुद्दे से ध्यान भटकाने की एक सोची-समझी कोशिश लगती है।

‘पर्सनल हियरिंग’ के नाम पर टालमटोल?
रिपोर्ट में शिकायतकर्ता को दफ्तर बुलाकर ‘पर्सनल हियरिंग’ देने का सुझाव दिया गया है। सवाल यह है कि जब उल्लंघन स्पष्ट है और मौके की तस्वीरें उपलब्ध हैं, तो फिर फील्ड एक्शन लेने के बजाय मामले को ‘चर्चा और मीटिंग’ के जाल में क्यों फंसाया जा रहा है? क्या यह फील्ड रिपोर्ट को दबाने और मामले को ठंडे बस्ते में डालने की रणनीति है?
उच्च अधिकारियों से हस्तक्षेप की उम्मीद
अब देखना यह होगा कि नगर निगम के उच्च अधिकारी इस भ्रामक रिपोर्ट का संज्ञान लेते हैं या फिर बिल्डिंग ब्रांच के अधिकारी इसी तरह “पुराने निर्माण” की आड़ में शहर की प्लानिंग और नियमों की धज्जियां उड़ाते रहेंगे। जनता मांग कर रही है कि व्यक्तिगत टिप्पणियों के बजाय ‘ओरिजिनल सैंक्शन प्लान’ के आधार पर मौके की जांच कर कानूनी कार्रवाई की जाए।




